गाव की गलीयों की की खाक छान रहे मराठी माध्यम के शिक्षक



रफीक कनोजे
झरी  : बहुल आदिवासी झरी तहसील अंतर्गत इन दिनों दो हजार आबादी वाले हर गांव में अंग्रेजी माध्यम शालाओं की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। जिसके कारण निजी मराठी शाला और जिला परिषद शालाओं की पटसंख्या दिन-ब-दिन तेजी से कम होती जा रही है। ऐसे में शिक्षकों की शाला का अस्तित्व बनाए रखने के लिए मराठी माध्यम के शिक्षकों को गांव की गलियों की खाक छाननी पड़ रही है।

झरी तहसील मे कुछ वर्ष पुर्व शिक्षा का माध्यम जिला परिषद की शालाये और आंगनवाड़ी ही  थी। उसके बाद कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों द्वारा मराठी शालाओं की तादात बढ़ती गई। लेकिन आज के आधुनिक युग में इन मराठी शालाओं की जगह अंग्रेजी शालाओं ने ले रखी है। जिसके कारण मराठी शालाओं में विद्यार्थियों की कमी नजर आ रही है। आज के युग में 2000 के ऊपर आबादी वाले हर गांव में अंग्रेजी माध्यम की शालाएं खुलती नजर आ रही है। आज जगह जगह अंग्रेजी शाला खुल गई है। नर्सरी, केजी वन, केजी टु से शिक्षा की शुरुआत हो रही है। और यह शालाये  कई गांव में दसवीं कक्षा तक पहुंच चुकी है। इसलिए अभिभावको द्वारा शिक्षा के लिए अंग्रेजी शालाओं में प्रवेश पर जोर दिया जा रहा है।

अपनी संतान अच्छी स्कूल में पढ़ाई करें इस हेतु हजारों रुपए डोनेशन देकर अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को प्रवेश दिलवाया जा रहा है। डोनेशन के साथ ही स्नेह सम्मेलन फी, यूनिफार्म फी, मेडिकल फी, और वाहन फी भी ली जाती है। लेकिन अभिभावकों का अंग्रेजी शालाओ  के प्रति आकर्षण कम नहीं हो रहा है। अंग्रेजी माध्यम शालाओं ने बच्चों के आवाजाही के लिए स्कूल बसों की सुविधा भी कर रखी है। लेकिन इसके विपरीत जिला परिषद शाला में व्यवस्था का सर्वथा अभाव है। जिस कारण बच्चे मराठी माध्यमिक शालाओं से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में शालाओं की शाख बचाने के लिए शालाये शुरू होने के पूर्व ही विद्यार्थी ढुंढने में शिक्षकों को गांव की गलियां की खांक छाननी पड़ रही है। निजी मराठी शालाओं में और जिला परिषद शाला में शिक्षक के हिसाब से विद्यार्थियों की संख्या नजर कम आ रही है। जिला परिषद शालाओं की हालत तो यह है कि विद्यार्थियों की उपस्थिति कम और शिक्षक की उपस्थीती जादा नजर आ रही हैं। और जहां दो  शिक्षक की शालाये  है वहा पर एक शिक्षक तो हाजिर रहता ही नहीं जिसके कारण अभिभावकों की धारणा बन चुकी है कि जिला परिषद शालाओं पर पदाधिकारी और अधिकारियों द्वारा अनदेखी की जाती है।

आज भी जिला परिषद शालाओं का अस्तित्व बनाए रखने के लिए व्यवस्था में सुधार लाने सुधार लाने की अत्यधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है। उच्च वर्गीय और मध्यम वर्गीय द्वारा अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में हजारों रुपए डोनेशन की फी भरकर प्रवेश दिलवाया जाता है। लेकिन गरीब तबके के बच्चों के लिए मराठी शाला ही ज्ञान प्राप्ति का एकमात्र साधन है।

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