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तीन महिने कर्जाचा हप्ता भरू नका सांगता, मग त्यावर व्याज कसं काय लावता ?

तीन महिने कर्जाचा हप्ता भरू नका सांगता, मग त्यावर व्याज कसं काय लावता ?



  • मे.सुप्रीम कोर्टाचा सवाल

नवी दिल्ली : करोनामुळे लॉकडाउन जाहीर करण्यात आल्याने अनेकांचं उत्पन्न बंद झालं आहे. याच पार्श्वभूमीवर रिझर्व्ह बँक ऑफ इंडियाने (आरबीआय) कर्जाचे हफ्ते ३१ ऑगस्टपर्यंत न भरण्याची मुभा दिली आहे. मात्र बँकांनी कर्जाचे हफ्ते पुढे ढकलण्याची मुभा दिली असली तरी त्यावरील व्याज मात्र वसूल केलं जाणार आहे. यासंबंधी मे.सर्वोच्च न्यायालयात याचिका दाखल करण्यात आली असून त्यावर  सुनावणी पार पडली.

यावेळी मे.सर्वोच्च न्यायालयाने तीन महिने कर्जाचा हप्ता भरू नका असं सांगता, मग त्यावर व्याज कसं लावता ? अशी विचारणा केली आहे. १७ जून रोजी याप्रकरणी पुढील सुनावणी होणार आहे.न्यायमूर्ती जे अशोक भुषण यांच्या अध्यक्षतेखालील खंडपीठासमोर ही सुनावणी पार पडली. याचिकेत बँकांनी हफ्ते माफ करण्यात आलेल्या काळात व्याजदेखील माफ करावं अशी मागणी करण्यात आली आहे. न्यायमूर्ती जे अशोक भुषण यांनी सुनावणीवेळी विचारणा केली की, जर तुम्ही तीन महिन्यांसाठी कर्ज माफ केलं आहे तर मग तुम्ही त्यावर व्याज कसं काय लावू शकता ही आमची मुख्य काळजी आहे.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता यांनी यावेळी आपल्याला यासंबंधी आर.बी.आय.च्या अधिकाऱ्यांसोबत बैठक घेऊन चर्चा करावी लागेल असं सांगितलं. एस.बी.आय.च्या वतीने मे. न्यायालयात बाजू मांडणारे वरिष्ठ वकील रोहतगी यांनीही आर.बी.आय.शी चर्चा करणं महत्त्वाचं असल्याचं यावेळी सांगितलं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता यांनी आठवड्याच्या शेवटी आर.बी.आय.चे अधिकारी तसंच अर्थ तज्ञांसोबत बैठक घेऊ अशी माहिती दिल्याने मे.सर्वोच्च न्यायालयाने १७ जून पर्यंत सुनावणी पुढे ढकलली आहे.दरम्यान आर.बी.आय.ने याआधी उत्तर देताना मे.सर्वोच्च न्यायालयात प्रतिज्ञापत्र दाखल केल असून सहा महिन्यांसाठी कर्जाचे हफ्ते भरण्यासाठी सूट दिली असताना त्यावरील व्याजही माफ केलं तर दोन लाख कोटींचं नुकान होईल. मे.सर्वोच्च न्यायालयाने याचिकेवर सुनावणी करताना आर.बी.आय.ला उत्तर देण्यास सांगितलं होतं.

 व्याज माफ केल्यास बँकांना खूप मोठ्या आर्थिक संकटाचा सामना करावा लागू शकतो असं बँकांचं म्हणणं आहे. बँकांवर दोन लाख कोटींचं ओझं निर्माण होईल असं आर.बी.आय.चं म्हणणं आहे.२५ मार्च रोजी आर.बी.आय.ने कर्जाचे हफ्ते न भरण्यासाठी तीन महिन्यांची मुभा देत असल्याचं जाहीर केलं होतं. यानंतर २२ जून रोजी अजून तीन महिन्यांसाठी ही सवलत जाहीर करण्यात आली.
लॉकडाउन के दौरान नागरिकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर स्वत: संज्ञान लिया, राज्य और केंद्र को नोटिस जारी

लॉकडाउन के दौरान नागरिकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर स्वत: संज्ञान लिया, राज्य और केंद्र को नोटिस जारी



  • COVID 19 महामारी से हम सभी प्रभावित हुए हैं, लेकिन इस दौरान हमारे कानून चुप नहीं रह सकते उन्हें हमारे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए काम करना जारी रखना चाहिए यह हमारे न्यायशास्त्र में अच्छी तरह से स्थापित है कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार, आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है इस न्यायालय को नागरिकों पर संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप के रूप में आए संकट के लिए सतर्क होना चाहिए.


केरल हाईकोर्ट ने कथित रूप से देशव्यापी लॉकडाउन का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ, पुलिस की बर्बरता की कथित घटनाओं का संज्ञान लिया है.

न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति शाजी पी चैली ने गैर-कानूनी पुलिस ज्यादतियों के मामले में राज्य के अधिकारियों के साथ-साथ भारत संघ को भी नोटिस जारी किए हैं पीठ ने माना कि कोरोना वायरस के संचरण की श्रृंखला को तोड़ने के लिए सामाजिक दूरी बनाए रखना जरूरी है और इस प्रकार राज्य ने भीड़ जमा न हो, इसे प्रतिबंधित करने के लिए पुलिस बलों की तैनाती की थी हालांकि, अदालत ने कहा कि वह मीडिया रिपोर्टों को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिनमें ऐसे पुलिस कर्मियों द्वारा हिंसा के उपयोग का खुलासा किया गया है.


  1. पीठ ने कहा,

हालांकि हम प्रिंट और सोशल मीडिया में बहुत सारी सामग्री देख चुके हैं, जो हमें विश्वास दिलाती हैं कि स्वास्थ्य अधिकारियों और पुलिस कर्मियों द्वारा अनुकरणीय कार्य किया जा रहा है हम कुछ लोगों की ओर आंख नहीं मूंद सकते हैं अन्य सामग्री जो पिछले एक सप्ताह में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में प्रकाशित हुई है, जो पुलिसकर्मियों द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान की गई ज्यादतियों को इंगित करती है अदालत ने कहा कि संकट की इस स्थिति में भी, लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.


  1. पीठ ने कहा,

COVID 19 महामारी से हम सभी प्रभावित हुए हैं, लेकिन इस दौरान हमारे कानून चुप नहीं रह सकते उन्हें हमारे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए काम करना जारी रखना चाहिए.

यह हमारे न्यायशास्त्र में अच्छी तरह से स्थापित है कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार, आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है इस न्यायालय को नागरिकों पर संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप के रूप में आए संकट के लिए सतर्क होना चाहिए.

इस प्रकार यह सुनिश्चित करने के लिए मामले का संज्ञान लिया गया कि राज्य में लॉकडाउन का कार्यान्वयन न्यायपालिका की "चौकस आंखों" के तहत किया जाए हमें अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के संबंध में भी नागरिकता के बीच भय को दूर करना है हम इस विचार के हैं कि केंद्र या राज्य के अधिकारियों द्वारा इस राज्य में लॉकडाउन का कार्यान्वयन, चौकस निगाहों के तहत होना चाहिए..

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वाहतूक नियमभंग: सलमान, राज, आदित्य यांनी दंड चुकवला

वाहतूक नियमभंग: सलमान, राज, आदित्य यांनी दंड चुकवला


मुंबई :- मुंबईत वाहतूक नियमांचे उल्लंघन केल्यामुळे झालेला दंड न भरणाऱ्यांच्या यादीत अभिनेता सलमान खान ,मनसेप्रमुख राज ठाकरे, युवासेनाप्रमुख आदित्य ठाकरे, मुंबईचे महापौर विश्वनाथ महाडेश्वर, परिवहन मंत्री दिवाकर रावते यांच्यासह अनेक दिग्गजांची नावं असल्याची धक्कादायक बाब समोर आली आहे. दरम्यान आपल्याला या दंडाबद्दल काहीच माहिती नसून वाहनचालकांनी वाहतुकीच्या नियमांचे उल्लंघन केले असल्याचं स्पष्टीकरण मुंबईचे महापौर विश्वनाथ महाडेश्वर यांनी यासंदर्भात दिलं आहे.

सिग्नल तोडणे, नो एन्ट्रीमध्ये वाहन नेणे ,झेब्रा क्रॉसिंगवर वाहनं उभी करणे अशा नियमभंगांसाठी दंड आकारला जातो. पण मुंबईत हा दंड इतर शहरांप्रमाणे रस्त्यावर ट्रॅफिक पोलीस वसूल करत नाहीत. नियम तोडणाऱ्या वाहनांच्या मालकांना दंडाचे ई-चलान वाहतूक विभाग पाठवते. त्या ई-चलाननुसार वाहनांच्या मालकांना ऑनलाइन दंड भरावा लागतो. गेल्या वर्षी ऑक्टोबरमध्ये ही ई-चलान पद्धती सुरू करण्यात आली होती.

मुंबई मिररमध्ये आलेल्या एका वृत्तानुसार मुंबईत ई-चलान पाठवलेल्यांपैकी बहुतांश लोकांनी दंड भरलाच नसून ११९ कोटी रुपये रकमेचा दंड वसूल करणे बाकी आहे. दंड न भरणाऱ्यांची एक यादी तयार करण्यात आली असून त्यामध्ये अनेक दिग्गजांची नावं आहेत. सलमान खान, आदित्य ठाकरे, माजी उपमुख्यमंत्री अजित पवार, भाजप प्रवक्ते राम कदम, मनसेप्रमुख राज ठाकरे यांचीही या यादीत नावं आहेत. दरम्यान अभिनेता अर्जुन कपूरने मात्र दंड भरला आहे. तर या यादीतील राम कदम यांनी ज्या कारला दंड झाला आहे ती कार आपण खूप काळापूर्वीच विकली असल्याचं सांगितलं आहे. सलमान खानने मात्र अजून यावर कोणतीही प्रतिक्रिया दिलेली नाही. ई-चलान येऊन ही दंड न भरणाऱ्यांपैकी अनेकांनी आपण कोणत्याही नियमांचे उल्लंघन केले नसतानाही आपल्याला ई-चलान आल्याचा आरोप केला आहे तर ई-चलान भरण्यासाठी कोणीही सक्ती करत नसल्यामुळे अनेक लोक दंड भरत नसल्याची माहिती एका वाहतूक पोलीस अधिकाऱ्याने दिली आहे.

 15 लाख रुपये कब जमा होंगे ? RTI के तहत ये सूचना नहीं : PMO ने CIC को बताया .

15 लाख रुपये कब जमा होंगे ? RTI के तहत ये सूचना नहीं : PMO ने CIC को बताया .



रुपये की जमा राशि की मांग आरटीआई प्रश्न 15 एल नागरिकों के खातों में, ‘सूचना’ नहीं, पीएमओ सीआईसी बताता है कब रु.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे के मुताबिक हर नागरिक के खाते में 15 लाख कब जमा होंगे ?  प्रधान मंत्री कार्यालय के समक्ष आरटीआई आवेदन में मोहन कुमार शर्मा ने ये सवाल पूछा था.
उन्होंने यह भी जानना चाहा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा से पहले ही प्रिंट के मीडिया हाउसों को कैसे पता चला.

शैक्षणिक योग्यता के संबंध में प्रश्न, आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की पिछली सेवा; तिथि, महीना और वर्ष जिसमें नोटों की छपाई शुरू की गई थी, आदि भी पूछे गए थे। प्रतिक्रिया से असंतुष्ट शर्मा ने केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की. आयोग के सामने CPIO ने दलील दी कि आरटीआई आवेदन में ये आरटीआई अधिनियम की धारा 2 (एफ) के अनुसार ‘सूचना’ की परिभाषा के तहत नहीं आती है.


मुख्य सूचना आयुक्त राधा कृष्ण माथुर ने पाया कि आरटीआई आवेदन को संतोषजनक ढंग से निपटाया गया था। आयोग ने आर्थिक मामलों के विभाग को आरबीआई के गवर्नर की नियुक्ति / शैक्षिक योग्यता के बारे में ब्योरा देने और मुद्रा नोट प्रिंटिंग के जवाब 7 दिनों के भीतर दे . 
सीआईसी ने कहा, देश में असहिष्णुता की घटनाओं को देखते हुए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के रिकॉर्ड को जाहिर करना बुद्धिमानी नहीं है

सीआईसी ने कहा, देश में असहिष्णुता की घटनाओं को देखते हुए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के रिकॉर्ड को जाहिर करना बुद्धिमानी नहीं है



केंद्रीय सूचना आयोग ने ‘ब्लू स्टार’ ऑपरेशन के बारे में सभी फाइलों और रिकार्ड्स की जानकारी नहीं देने को सही ठहराया और कहा कि इस रिकॉर्ड को अभी जाहिर करना बुद्धिमानी नहीं होगी जब देश में समुदायों के बीच पहले ही इस तरह की असहिष्णुता फ़ैली हुई है.

आवेदक नवदीप गुप्ता ने आरटीआई आवेदन पीएमओ में दायर कर भारतीय सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में सभी फाइलों की जानकारी माँगी थी। बाद में इस आवेदन को सेना को भेज दिया गया जिसने इस बारे में सूचना इस आधार पर देने से मना कर दिया कि यह देश की सुरक्षा और खुफिया रिकॉर्ड से जुड़ा है.

आयोग के समक्ष दिए गए आवेदन के जवाब में सेना ने कहा कि अभी तक ये रिकार्ड्स वर्गीकृत नहीं हैं और अंततः संबंधित सूचना राष्ट्र-विरोधी तत्वों और बाहरी एजेंसियों को देश में अलगाववादी गतिविधियों को पुनर्जीवित करने को उत्साहित करेगा. फिर जानकारियों की निहित स्वार्थ वाले समूहों द्वारा गलत व्याख्या का भी डर है जिसकी वजह से हिंसा फ़ैल सकती है और अराजकता पैदा हो सकती है और यह देश की सुरक्षा को प्रभावित करेगा फिर जिस तरह की विस्तृत सूचना माँगी गई है उससे ऑपरेशन में शामिल सुरक्षा बलों को निशाना बनाए जाने की आशंका है,” सेना सीपीआईओ ने सीआईसी से कहा.


जहाँ तक सीआईसी के इस प्रश्न की बात है कि घटना के 30 साल बाद भी क्या इसका देश की सुरक्षा पर असर पड़ेगा, सेना ने कहा कि इस ऑपरेशन के 28 साल बाद भी ले. जन. केएस बरार (अवकाशप्राप्त) जो कि जेड प्लस सुरक्षा में रहते हैं, पर अक्टूबर 2012 में भारत में नहीं बल्कि लंदन में हमला हुआ क्योंकि वे ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े थे.
कलकत्ता HC ने राज्य चुनाव आयोग को व्हाट्सएप पर भेजे गए वैध नामांकन पत्रों को मंजूर करने के निर्देश दिए

कलकत्ता HC ने राज्य चुनाव आयोग को व्हाट्सएप पर भेजे गए वैध नामांकन पत्रों को मंजूर करने के निर्देश दिए



एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग से भंगूर के उन नौ उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों के सत्यापन के लिए कहा है, जिन्होंने इसे व्हाट्सएप के माध्यम से ब्लॉक विकास अधिकारी को भेजा था .
आदेश पारित करने से पहले न्यायमूर्ति सुब्रत तालुकदार ने आयुक्त द्वारा दक्षिण 24 परगना के जिला मजिस्ट्रेट और जिला पंचायत चुनाव अधिकारी को संबोधित 23 अप्रैल, 2018 के दस्तावेज पर ध्यान दिया और इसे अंटाजुल खान और 10 अन्य के नामांकन पत्र प्राप्त करने और  आ .

अदालत ने दूसरे दस्तावेज को भी देखा जिसमें 23 अप्रैल, 2018 के जिला मजिस्ट्रेट और जिला पंचायत और ग्रामीण विकास अधिकारी का आदेश था, जो याचिकाकर्ताओं के नामांकन पत्र प्राप्त करने के रूप में 23 अप्रैल, 2018 के न्यायालय के आदेश के अनुपालन का खुलासा करते थे.

 यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि 11 उम्मीदवारों ने 23 अप्रैल को अदालत को सूचित किया था कि वे आयोग द्वारा दिए गए विस्तार (एक अतिरिक्त दिन) के बावजूद अपने नामांकन दर्ज करने में असमर्थ रहे हैं .
यह पोलरहाट – द्वितीय ग्राम पंचायत से प्राप्त रिपोर्ट से साफ है कि 9 अप्रैल, 2018 तक प्रत्येक 16 (सोलह) निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल एक नामांकन दर्ज किया गया है।याचिकाकर्ताओं ने कहा कि याचिकाकर्ता, जो संख्या में 11 (ग्यारह) हैं, आयोग द्वारा आज दिए ग.
कोर्ट ने पश्चिम बंगाल राज्य आयोग के सचिव नीलंजन संदीला के सबमिशन को भी इस हद तक दर्ज किया था कि आयोग याचिकाकर्ताओं (नौ में सभी) को नामांकन दाखिल करने के लिए अपने सहयोग का विस्तार करेगा, बशर्ते नामांकन / कागजात सही हों। इसके अनुसार उस अवधि के दौरान जब. नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया चालू थी, याचिकाकर्ताओं को आयोग की तरफ से उप-मंडल अधिकारी अलीपुर के कार्यालय में अपने कागजात दाखिल करने के निर्देश दिए गए थे.

हालांकि याचिकाकर्ताओं ने मंगलवार यानी 24 अप्रैल को अदालत को सूचित किया कि उप-मंडल कार्यालय, अलीपुर के कार्यालय में इंतजार करने के लिए कहा जा रहा है, उन्हें बुरी तरह से प्रताडि़त किया गया, उनके दस्तावेजों और सामानों को बदमाशों द्वारा छीन लिया गया और नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका गया। 11 में से नौ ने व्हाट्सएप के माध्यम से अपने कागजात भेजे.

आयुक्त और जिला मजिस्ट्रेट के उपरोक्त निर्दिष्ट दस्तावेजों के संबंध में, 23 अप्रैल, 2018 दोनों को इस अदालत के अवलोकन / निर्देशों के प्रकाश में पढ़ा गया, 23 अप्रैल, 2018 को इस याचिका में आयोग नामांकन पत्रों को वैध नामांकन पत्रों के रूप में मानने के लिए. अब आगे बढ़ेगा  और 9 (नौ) याचिकाकर्ता दाखिल नामांकन के आधार पर 2018 पंचायत चुनाव में अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों से लड़ने के हकदार होंगे, “न्यायमूर्ति तालुकदार ने आदेश दिया..
बेचने लायक खाद्य सामग्री बनाने के लिए मिलावट खाद्य सामग्री को बचाकर रखना अपराध : सुप्रीम कोर्ट.

बेचने लायक खाद्य सामग्री बनाने के लिए मिलावट खाद्य सामग्री को बचाकर रखना अपराध : सुप्रीम कोर्ट.



सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली प्रशासन बनाम विद्या गुप्ता मामले में कहा है कि बेची जाने वाली खाद्य सामग्री बनाने के लिए मिलावटयुक्त खाद्य सामग्री को बचाकर रखना अपराध है.
न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा कि कोर्ट को खाद्य अपमिश्रण अधिनियम के तहत निदेशक के प्रमाणपत्र में जो बातें कही गई हैं सिर्फ उस पर गौर करना चाहिए। उसे सार्वजनिक विश्लेषक या निदेशक के बीच किसी अंतर पर गौर करने की ज़रू.
दिल्ली प्रशासन द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह बात कह 

 प्रशासन ने मिलावटी घी रखने के दोषी एक विक्रेता को छोड़ दिए जाने के खिलाफ यह अपील की थी। सत्र न्यायालय द्वारा इस व्यक्ति को बरी किये जाने के फैसले को हाई कोर्ट ने भी दो आधार पर .पीठ ने कहा कि खाद्य अपमिश्रण अधिनियम की धारा 7 में स्पष्ट कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मिलावटी सामान रखता है . 

 और उससे कोई खाद्य सामग्री बनाता है जो बेचा जाएगा तो यह माना जाएगा कि वह मिलावटी सामान रखता है  . कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम बनाम लक्ष्मी नारायण टंडन मामले में दिए गए फैसले का उदाहरण देने की आरोपी की दलील को भी खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि यह फैसला अधिनियम में संशोधन से पहले दिया गया था.पीठ ने फैसले में कहा कि निदेशक की रिपोर्ट को पीए की रिपोर्ट पर तरजीह दी जाएगी और इस बारे में मिला प्रमाणपत्र अंतिम निर्णयात्मक रिपोर्ट होगी .

 कोर्ट ने आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को निरस्त कर दिया और उसने जितना समय जेल में गुजारा है उतने ही समय की सजा उसे दी यह देखते हुए कि उसका व्यवसाय बंद हो चुका है और वह लगभग 70 साल का हो गया है.
किसी महिला को सिर्फ अगवा करने से ही आईपीसी की धारा 366 के तहत मामला नहीं बनता : सुप्रीम कोर्ट

किसी महिला को सिर्फ अगवा करने से ही आईपीसी की धारा 366 के तहत मामला नहीं बनता : सुप्रीम कोर्ट



सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी महिला को अगवा भर करने और और इस बात का कोई सबूत नहीं होने से कि ऐसा किसी व्यक्ति के साथ जबरन शादी करने या उसके साथ संभोग के लिए बाध्य करने के लिए किया जा रहा है, आईपीसी की धारा 366 के तहत मामला नहीं बनता। शुरू में ज.शुरू में जो एफआईआर दायर किया गया था उसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी जबरदस्ती उसको अपने घर ले गया . 

पांच दिन बाद, एक पूरक बयान दिया गया जिसमें शिकायतकर्ता ने कपड़े उतरवाने और गलत तरीके से छूने और छेड़खानी का आरोप भी शामिल कर दिया। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम . न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल ने इस बात पर गौर किया कि शुरू में शिकायत में छेड़छाड़ की बात को शर्म के मारे शामिल नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा, “इस बारे में जो बताया गया है . 

 वह आत्मविश्वास पैदा नहीं करता क्योंकि एफआईआर घटना के पांच दिन.पीठ ने कहा, “जहाँ तक आईपीसी की धारा 366 की बात है, सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं है कि महिला को अगवा किया गया था, आगे यह भी साबित किया जाना जरूरी है कि आरोपी ने महिला को उससे शादी करने के लिए बाध्य करने या फिर उसके उसके साथ गैरकानूनी तरीके से सहवास के. कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित भी हो जाता है कि आरोपी उसको जबरदस्ती अपने घर ले गया, पर बाद में उसने जो बयान दिया कि उसकी इच्छा उससे शादी करने या उसको बहला फुसला कर उसके साथ संभोग करने की थी, वह महज एक बाद का विचार है।  ज्यादा से ज्यादा यह कहा जा सकता है.
आधार-मोबाइल क्रमांकाचा दुवा साधू नका - सर्वोच्च न्यायालयाने म्हटल्याप्रमाणे

आधार-मोबाइल क्रमांकाचा दुवा साधू नका - सर्वोच्च न्यायालयाने म्हटल्याप्रमाणे



नवी दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालयाच्या निर्देशांनुसार आधार कार्डधारकांना आधार कार्डशी जोडले जाण्याचे वेडगळ जलद होते. सुप्रीम कोर्टाने बुधवारी स्पष्ट केले की, त्यांनी अनिवार्य संबंध करण्याचे आदेश दिले नव्हते आणि सरकारने 6 फेब्रुवारी 2017 चे अंदाधुंध चुकीचे असल्याचे सांगितले आणि त्यावर करण्याचे आश्वासन दिले."लोकनीती फाऊंडेशनच्या बाबतीत, एससीने सिडीला यूआयडीशी जोडण्याचे निर्देश दिले नाहीत. परंतु केंद्र शासनाच्या परिपत्रानुसार असे म्हटले आहे. न्यायालयाने कोणतीही दिशा दिली नाही, "न्यायमूर्ती डी. वाई. चंद्रचूड यांनी मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा आणि न्यायमूर्ती ए. के सीकरी, ए एम खानविलकर आणि अशोक भूषण यांचा समावेश असलेल्या खंडपीठापुढे सुनावणीदरम्यान सांगितले.सीजीआयच्या नेतृत्वाखालील पीठाने स्पष्ट केले की 6 फेब्रुवारी, 2017 रोजी ऑर्डर ऑर्डर झाल्यानंतर ऍटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी यांनी सादर केले की आधार ही ग्राहकाची ओळख पडताळणीसाठी वापरली जाणारी कागदपत्रे आहेत.उल्लेखनीय म्हणजे यूआयडीएआयला उपस्थित असलेल्या ज्येष्ठ वकील राकेश द्विवेदी यांनी खंडपीठ मान्य केली आणि म्हणाले की, मोबाइल फोन ग्राहकांच्या पडताळणीसाठी सरकारने SC च्या निरिक्षण घेतले आहे.द्विवेदीच्या 6 फेब्रुवारीच्या आदेशाकडे लक्ष वेधण्यात यावे, असे खंडपीठाने स्पष्ट केले. न्यायालयाने एजीची याचिका सादर केली की, "तत्काळ प्रभावी कारवाई केली जाईल आणि ओळख पडताळणीची प्रक्रिया एक वर्षाच्या आत पूर्ण केली जाईल".द्विवेदींनी असा दावा केला की आधार क्रमांक असलेल्या मोबाईल नंबरची एक वेळची सीडिंग फार मोठी नाही आणि नागरिकांच्या गोपनीयतेचा गैरवापर होऊ शकत नाही कारण आधार कार्डद्वारे कोणतेही कॉल रेकॉर्ड ठेवण्यात आले नाहीत.यूआयडीएआयच्या आग्रहाची की सर्वोच्च न्यायालयाने सर्व मोबाईल कनेक्शनला आधार कार्डशी जोडणे बंधनकारक केले होते आणि कथित आचारसंहिता पाळण्याच्या प्रयत्नांवर सशक्त संदेशांसह ग्राहकांना अडथळा आणणार्या मोबाइल सेवा प्रदात्यांसह, अशा प्रकारचे मोबाईल सेवा प्रदाते होते.13 मार्चला एससीने आधार क्रमांक जोडणे आणि मोबाईल क्रमांक आणि व्यक्तींचे बँक खाते याबाबतचा कालावधी निश्चित करणे अनिवार्य केले होते आणि सरकारला या संदर्भात आणखी काही उपाययोजना करण्यासाठी आधार कार्डची वैधता निश्चित होईपर्यंत प्रतीक्षा करण्यास सरकारला सांगितले होते.केंद्रीय अंतरिम मंत्रिमंडळाच्या बैठकीत 31 मार्चपर्यंत बँक खातेधारकांकडे बँक खाते उघडण्याची मुदत वाढविण्यात आली .