जय हिंद दोस्तो..
मै हु राष्ट्रध्वज...तिरंगा
बात करना चाहता हु आपसे,
इस देश ने इतना सराया है मुझे,
कुछ और भी चाहता हु आपसे..
याद है मुझे आज भी वो तमाम क्रांतिकारी
जो रोया करते थे मुझे हाथ मे लिए आजादी के लिए..
आये दिन मै याद आता हु बस १५ आगस्त,२६ जनवरी के लिए..
मैने नही कहा था मुझे इतना सर आखो़ पर बैठाया जाए..
१५ अगस्त २६ जनवरी हुये बाद मुझे
रास्ते पर फेंका जाए..
लावारीस पडा रहता हु घर के किसी कोने मे,
यूही चलता रहा ,
तो महसूस कर रहा हु की ज्यादा दिन नही अब मुझे खत्म होने मे...
भारत-पाकिस्तान का बटवारा अपनी आखों
से देखा था..
मेरा तक बटवारा होगा ये सपने मे भी न
सोचा था..
अरे मुझमे जो रंग डाले गए वे किसी धर्म के नही
थे..
वे शौर्य-शांती और हरियाली के थे...
मत बनिये हिंदु या फिर मुसल्मान,
आजाद हुवा ये देश ताकी आप बन सके
गु़लामो से इन्सान...
दिल तो करता है की लहराना छोड दु ,
मगर उन कुर्बानियोसे कीया वादा कैसे तोड दु...?
नही कर सकते तो मत कीजिए ये दीखावे वाला आदर..
खुश हु मै बनके इस देश के नौजवानो के कफन
की चादर...!
अनिकेत व.प्र. देशमुख
