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इस लफ़्ज़ से शनासाई तो बहुत बाद में हुई मगर इश्क़ पहली बार महसूस तब किया जब अब्बू ने परवीन शाकिर का मजमुआ-ए-क़लाम हाथ में लाकर रखा जैसे जैसे पढ़ती गयी इश्क़ महसूस होने लगा और ख़त्म होते होते इश्क़ एक शक्ल इख़्तियार कर चुका था और पहली बार इश्क़ का पैकर देखा परवीन शाकिर की शक्ल में 13 साल की उम्र में जो इश्क़ का बीज दिल के किसी अँधेरे कोने में फूटा था वो आज घने शजर की शक्ल ले चुका है और मेरे वजूद को ख़ुद में समेट चुका है.. अब उसी शजर से आने वाली हवा से साँसे चल रही हैं, उसी शजर से गिरने वाले बीज मेरे अंदर रोज़ एक नये पौधे को जन्म दे रहे हैं । मैं पाक परवरदिगार रब्बुल इज़्ज़त की शुक्रग़ुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे ये पाकीज़ा इश्क़ अता फ़रमाया । परवीन शाकिर तुम मेरा इश्क़ हो .
गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो
कोई वजूद मोहब्बत का इस्तिआ'रा हो
कोई वजूद मोहब्बत का इस्तिआ'रा हो
मैं गहरे पानी की इस रौ के साथ बहती रहूँ
जज़ीरा हो कि मुक़ाबिल कोई किनारा हो
जज़ीरा हो कि मुक़ाबिल कोई किनारा हो
कभी-कभार उसे देख लें कहीं मिल लें
ये कब कहा था कि वो ख़ुश-बदन हमारा हो
ये कब कहा था कि वो ख़ुश-बदन हमारा हो
क़ुसूर हो तो हमारे हिसाब में लिख जाए
मोहब्बतों में जो एहसान हो तुम्हारा हो
मोहब्बतों में जो एहसान हो तुम्हारा हो
ये इतनी रात गए कौन दस्तकें देगा
कहीं हवा का ही उस ने न रूप धारा हो
कहीं हवा का ही उस ने न रूप धारा हो
उफ़ुक़ तो क्या है दर-ए-कहकशाँ भी छू आएँ
मुसाफ़िरों को अगर चाँद का इशारा हो
मुसाफ़िरों को अगर चाँद का इशारा हो
मैं अपने हिस्से के सुख जिस के नाम कर डालूँ
कोई तो हो जो मुझे इस तरह का प्यारा हो
कोई तो हो जो मुझे इस तरह का प्यारा हो
अगर वजूद में आहंग है तो वस्ल भी है
वो चाहे नज़्म का टुकड़ा कि नस्र-पारा हो
वो चाहे नज़्म का टुकड़ा कि नस्र-पारा हो
इकरा अम्बर बॉम्बे
