सही मायने में सच्चा एवं परिपक्व प्रेम वह होता है

जो कि अपने प्रिय के साथ हर दुःख-सुख, 
धूप-छाँव, पीड़ा आदि में हर कदम सदैव साथ रहता है और अहसास कराता है कि मैं हर हाल में तुम्हारे साथ, 
तुम्हारे लिए हूँ 
प्रेम को देखने-परखने के सबके नजरिए अलग हो सकते हैं 
किंतु प्रेम केवल प्रेम ही है और प्रेम ही रहेगा क्योंकि अभिव्यक्ति का संपूर्ण कोष रिक्त हो जाने के बावजूद और अहसासों की पूर्णता पर पहुँचने के बाद भी प्रेम केवल प्रेम रहता है 
प्रेम दिवस पर से शुभकामनाएं 
                                                                         

                                                                                   सुरेंद्र चतुर्वेदी

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